My Diary

Some piece of writings selected from the pages of my diary

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    उलझन

    रखा क्या अब है गाने को रास्ता कहाँ है ढूंढने को बेचैनियाँ , बेताबियाँ और- क्या दिल को है सताने को वादें , यादें , कसमें और रस्में और क्या-क्या है भुलाने को उजाले की इन्तज़ार है क्यों जब यह शमा भी है बुझाने को मुहब्बत है अगर दिल को दिल से बेताबी क्यों हैं ज़माने को कहाँ जाऊँ अब किस से पूछूँ  उलझन हज़ार है मिटाने को

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    बेवफा

    कितने है सावन आये गये,अब आँखों में हैं बादल छाये।तरसे हे मन बरसे है नैनकभी मिलन का न सावन आए।  जीवन के इस मोड़ पे देखो बदल रहा हैं मन तुम्हारा मेरा।गुम हो रहा हे धीरे प्यार हमारा छा रहा है अब दिल में अँधेरा।। मिलन न हुआ पर जुदा हुए वफ़ा न दिया पर बेवफा हुए। शायद मज़बूरी है या कुछ और न खबर क्यों…

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    भूल

    हम से न जाने कैसे ये भूल हुई जो जुगनू को समझ लिया सितारा। क्यों हमने सोचा अकेली राहों में ,घोर अँधेरे में मिल ही लिया सहारा।। अब भी हम तैर रहे हैं थक के भी,उस पार अगर हो या न हो किनारा। बिखरी जुल्फों को ओर बिखरा दियाइक हवा का झोंका भी न इसे सवारा।। निगाहों के आगे दूर दूर तक है वीरानी फिर क्यों दिल होले से…

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    हवा का झोंका

    एक हवा का झोंका दस्तक दी दरवाज़े में ऐसे फिर से मेरा। मुरझाया फूल खिलने लगी आँगन महका फिर से मेरा ।। बादल बरसना छोड़ दिया था खुशबु महकना भूल झुका था,पवन जो सरकाया आँचल मेरादिल आज धड़का फिर से मेरा ।। तूफ़ान मे कश्ती फटक गयी थीजब दूर साहिल दिखने लगी,बेरंग दुनिया मे रंग भरा आँखें चमका फिर से मेरा ।। अश्कों की बरसात थम गया तो हंसी के फूल खिलने लग गयी आशाएँ…

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    गुमराह

    वक्त ने मुझे गुमराह किया था यह नहीं है मेरी मंज़िल। जिस मोड़ में राह झूठा था उसकी खोज में है अब दिल।  यहाँ से निकलजाने की सोचूँ या अपनी मंजिल को खोजूं ?क्या करूँ ? क्या ना करूँ ? कभी सफर ही हत्म करना मैं सोचूँ।  ज़िंदगी तो कुछ हल्का-सा था कब यह भारी से भारी होगया ?फूलों से सजी राहों में कब काँटें बरसना ज़ारी होगया ? मौसम की नादानियाँ ही देखो प्यास…